Supreme Court Big Decision – सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो भारत की बेटियों के लिए एक बड़ी राहत और न्याय की दिशा में अहम कदम है। इस नए निर्णय के अनुसार अब शादीशुदा बेटियों को भी उनके पिता की जमीन और संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलेगा। पहले अक्सर देखा जाता था कि विवाह के बाद बेटियों को संपत्ति से वंचित कर दिया जाता था, यह मानकर कि वे अब ससुराल की सदस्य हैं। लेकिन अब कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विवाह किसी बेटी के उत्तराधिकार अधिकार को खत्म नहीं करता है। इस फैसले से देश की लाखों महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक न्याय मिलेगा, खासकर उन बेटियों को जो वर्षों से अपने हिस्से के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय — बेटियों को बराबर का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह स्पष्ट किया कि बेटी भी बेटे की तरह पिता की संपत्ति की बराबर की हकदार है, चाहे उसकी शादी हो चुकी हो या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटी का जन्म से ही पैतृक संपत्ति में अधिकार होता है और यह अधिकार विवाह से समाप्त नहीं होता। इस फैसले का सीधा असर उन मामलों पर पड़ेगा, जहां बेटियों को संपत्ति देने से इनकार किया गया था। अब यदि किसी बेटी को संपत्ति में उसका हिस्सा नहीं दिया जाता, तो वह कानूनी कार्रवाई कर सकती है और कोर्ट के इस निर्णय का लाभ उठा सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव की उम्मीद
यह कानून विशेष रूप से ग्रामीण भारत में बदलाव लाएगा, जहां आज भी पारंपरिक सोच बेटियों को जमीन में हकदार नहीं मानती। अब गांवों में भी रजिस्ट्री, खसरा, खतौनी जैसे दस्तावेजों में बेटियों का नाम दर्ज किया जाएगा और उन्हें अपने हक का कानूनी प्रमाण मिलेगा। यह बदलाव महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगा और परिवारों में बेटियों के प्रति भेदभाव को भी कम करेगा। सरकार ने सभी जिलाधिकारियों और तहसील अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी कर दिए हैं कि वे संपत्ति रिकॉर्ड में बेटियों का नाम अनिवार्य रूप से जोड़ें।
महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम
इस फैसले को महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव माना जा रहा है। पहले संपत्ति के मामलों में बेटियों को अक्सर सामाजिक दबाव के कारण चुप करा दिया जाता था, लेकिन अब उन्हें कानूनी सहारा मिलेगा। यह निर्णय महिलाओं को केवल संपत्ति का हक नहीं देगा, बल्कि समाज में उनकी स्थिति को भी मजबूत करेगा। यह फैसला समाज में लैंगिक समानता को बढ़ावा देगा और महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए मुखर होने का साहस भी देगा।
भविष्य में क्या होगा असर?
इस कानून के लागू होने के बाद अब हर बेटी को अपने अधिकार के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा। अदालत का यह फैसला एक नजीर बनेगा, जिससे अन्य पारिवारिक विवादों में भी बेटियों को न्याय मिलेगा। यह निर्णय न सिर्फ न्याय व्यवस्था की जीत है, बल्कि सामाजिक सोच में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत भी है।
